सरस्वती की प्रतिध्वनि !
सदियों
पूर्व विलुप्त हुई
सरस्वती नदी के
पूर्ववर्ती विशाल तटों पर
फैले पुरातन भग्नावशेष
आज भी एक
मूक परन्तु गंभीर
सी प्रतिध्वनि सतत
संचारित करते हैं
जिसमें भारतीय इतिहास
के अनेक अनसुलझे
रहस्य समाहित हैं
I जब भी मैं
उन भग्नावशेषों के
पास कभी रुकता
हूँ और सोचता
हूँ तो मन
एक अत्यंत गंभीर
चिंतन में समाहित हो जाता है और
ऐसा प्रतीत होता
है मानो पुरातन
काल की अनेक
विस्मृत कहानियां कुछ नया
रहस्योद्घाटन करना चाहती
हों जिससे हमारे
बीते हुए इतिहास
को नवीन दृष्टिकोण
से समझा जा
सके I वास्तव में
यदि हम भारतीय
इतिहास के वर्तमान
ज्ञान को देखें
तो हम पाएंगे
की आज की
हमारी जो भी
समझ हैं वह
पिछले लगभग २००
से कुछ अधिक
वर्षों के दौरान
किये गए शोधों
पर ही आधारित
है I सन १७८४
में "एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़
बंगाल" की स्थापना
के पश्चात ही
औपचारिक रूप से
भारतीय इतिहास के अनेक
पहलुओं का दस्तावेजीकरण
प्रारम्भ हुआ और
अथक परिश्रम तथा
समय बीतने के
साथ अनेक नए
तथ्य प्रकाश में
आते गए जो
सदियों पूर्व विस्मृत हो
चुके थे I इस
प्रारंभिक समय के
सबसे महत्वपूर्ण खोजों
की अगर हम
चर्चा करें तो
जेम्स प्रिन्सेप द्वारा
ब्राह्मी लिपि का
पढ़ा जाना तथा
बौद्ध दस्तावेजों के
आधार पर एलेग्जेंडर
कन्निंघम द्वारा अनेक ऐतिहासिक
स्थलों का अध्ययन
एवं उत्खनन का
प्रारम्भ होना अविस्मरणीय
हैं I अनेक विदेशी
शोधकर्ताओं ने भारत
के पुरातन ग्रंथों
का अनुवाद तथा
अध्ययन किया जिसमे
जर्मनी के मैक्स
मुएलर तथा अन्य
का अत्यंत महत्वपूर्ण
योगदान रहा I भारतीय ज्ञानियों
ने भी अपने
पुरातन ग्रंथों का पुनः
अवलोकन नए दृष्टिकोण
से किया जिसमे
महर्षि दयानन्द तथा बाल
गंगाधर तिलक के
कार्य अभूतपूर्व रहे
I
| भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा बिंजौर (अनूपगढ़, राजस्थान) में सरस्वती तट पर उत्खनन के समय, फ़रवरी, २०१७ |
आज
जब हम उन
कार्यों का अवलोकन
करते हैं तो
उस समय के
ज्ञान के आधार
पर अनेक निष्कर्ष
उनमे पाते हैं
जिसमे समय के
साथ आमूलचूल परिवर्तन
हुआ है I उदाहरण
के तौर पर
यह सर्वज्ञात है
की सिर्फ १००
वर्ष पूर्व हड़प्पा
अथवा सिंधु घाटी
की सभय्ता और
संस्कृति के बारे
में कोई भी
नहीं जानता था
I मैक्स मुएलर जैसे ज्ञानियों
ने भारत के
इतिहास को केवल
१५०० इसा पूर्व
के लगभग आर्यों
के आगमन से
प्रारम्भ माना था
I कालांतर में जब
मोहनजोदरो और हड़प्पा
के अलावा अनेक
अन्य स्थानों पर
भी पुरातन भग्नावशेष
मिलने लगे तो
इतिहासविदों में इस
संस्कृति के उद्गम
तथा समापन को
लेकर अनेक कल्पनाओं
का जन्म हुआ
जिसने इतिहास की
पुस्तकों में स्थान
भी पाया I विशेष
रूप से जब
इतिहासविदों ने भारत
के मूल ग्रंथों
तथा उत्खनन से
प्राप्त अवशेषों के अध्ययन
में सामंजस्य नहीं
होता पाया तब
उन्होंने ग्रंथों में उल्लेखित
अधिकांश तथ्यों को काल्पनिक
अथवा काव्यात्मक श्रेणी
में ही समझा
I कुछ ऐसा ही
सरस्वती नदी के
साथ ही हुआ
जिसको पूर्व में
इतिहासकार अद्यतन जानकारी के
अभाव में समझ
नहीं पाए जबकि
ऋग्वेद एवं प्राचीन
ग्रंथों में इस
नदी का "अम्बितमे
नदीतमे देवितमे सरस्वती (ऋग्वेद - २.४१.१६)
" के रूप में
विस्तार से वर्णन
किया गया था
I
वेदों
में सरस्वती के
तट पर उसकी
प्रेरणा से ऋषियों
के आश्रमों में
ही अधिकांश ऋचाओं
के उद्गम की
बात प्रकाश में
आती है I वेदों
में सरस्वती को
सबसे बड़ी और
महत्वपूर्ण नदी बताया
गया है जो
अत्यंत विशाल वेग के
साथ हिमालय से
समुद्र तक बहती
थी I महाभारत
में भी सरस्वती
का विस्तृत वर्णन
उपलब्ध है
जिसमे इसे हिमालय
से समुद्र तक
बहने वाली विशाल
नदी के रूप
में बताया गया
है और इसके
तटों पर अनेकों
तीर्थों तथा ऋषियों
के आश्रमों का
उल्लेख किया गया
है I सरस्वती नदी
के दक्षिण तथा
दृषाद्वती के उत्तर
अवस्थित क्षेत्र को ही
वेदों के उद्गम
स्थल तथा आर्यों
की अति पवित्र
पुण्यभूमि कुरुक्षेत्र के रूप
में वर्णित किया
गया है जहाँ
अनेक वैदिक ऋषियों
के आश्रमों तथा
१०० से भी
अधिक महत्वपूर्ण तीर्थों
के अवस्थित होने
का उल्लेख है
I अपने वनवास काल में
पांडवों ने अधिकांश
समय सरस्वती तट
पर स्थित द्वैतवन
तथा काम्यकवन में
व्यतीत किया था
जहाँ सरस्वती में
आने वाली वार्षिक
बाढ़ का भी
सुन्दर चित्रण किया गया
है जो इसके
उस काल में
अगाध जल से
परिपूर्ण होने का
प्रमाण है I जब
महाभारत का युद्ध
सरस्वती के तट
पर ही स्थित
कुरुक्षेत्र में प्रारम्भ
हुआ तब बलराम
ने प्रभासक्षेत्र (गुजरात)
से हिमालय तक
स्थित सरस्वती के
तीर्थों की यात्रा
प्रारम्भ की और
युद्ध की समाप्ति
पर भीम और
दुर्योधन के युद्ध
के समय उपस्थित
हुए I बलराम की
तीर्थयात्रा में सरस्वती
के तट पर
स्थित विनाशन तीर्थ
का भी उल्लेख
है जहाँ कुछ
दुरी के लिए
सरस्वती भूमि के
अंदर विलीन होकर
पुनः प्रकट होती
थी और जिसे
आज कुछ इतिहासकार
सरस्वती के धीरे
धीरे विलुप्त होने
के प्रमाण के
रूप में भी
समझने लगे हैं
I
आधुनिक
विज्ञानं तथा ऐतिहासिक
शोधों के कारण
सदियों से विलुप्त
सरस्वती आज फिर
से जीवंत हो
उठी है I वैज्ञानिकों
के अध्ययन के
आधार पर अब
यह सिद्ध हो
गया है की
सरस्वती वास्तव में वेदों
में वर्णित स्वरुप
के अनुसार आज
से लगभग ५०००
वर्ष पहले हिमालय
से समुद्र तक
बहती थी I उपग्रह
(सैटेलाइट) से प्राप्त
चित्रों में पूर्ववर्ती
सरस्वती के सभी प्रवाह मार्गों को साक्षात्
देखा जा सकता
है जिसमे अनेक
स्थानों पर ३
से ६ किलो
मीटर तक इसका
विस्तार देखा जाता
है I अनेक शोधों
के पश्चात अब
यह माना जा
रहा है की
लगभग २७०० से
१९०० इसा पूर्व
के बीच में
कतिपय कारणों से
सरस्वती धीरे धीरे
विलुप्त होती चली
गयी I हालांकि विलुप्त
होने के बाद
भी लोगों ने
इसको विस्मृत नहीं
होने दिया तथा
पूजा अर्चना करते
रहे I यहाँ तक
की प्रयाग में
गंगा तथा यमुना
के संगम स्थल
में सरस्वती के
गुप्त मिलन की
बात कर वहां
त्रिवेणी संगम के
रूप में दोनों
सरिताओं के साथ
सरस्वती की स्मृति
को भी जीवित
रखा गया I
ऐतिहासिक
दृष्टिकोण से यह
अत्यंत उल्लेखनीय है की
हड़प्पा संस्कृति से जुड़े
सबसे अधिक स्थल
(६० % से ज्यादा)
सरस्वती के तट
पर ही पाए
जाते हैं तथा
नदी के सुख
जाने के बाद
१९०० इसा पूर्व
में सप्त-सिंधु
के इलाके से
संस्कृति का फैलाव
धीरे धीरे गंगा
यमुना के मैदानी
इलाकों में हुआ
जो लगातार किये
जा रहे उत्खननों
से सिद्ध होता
है I वेदों के
बाद के ग्रंथों
में सरस्वती को
अक्सर पुराने महत्व
के कारन पूज्यनीय
पाया गया है
परन्तु गंगा सबसे
अधिक पूज्य नदी
के रूप में
उभरती है जिसके
किनारे आज के
प्रचलित हिन्दू धर्म के
मुख्य तीर्थ स्थल
भी विद्यमान हैं
I शोधों से प्राप्त
तथ्य बताते हैं
की पूर्व में
अदि बद्री (यमुनानगर
जिला , हरियाणा) से प्रवाहित
होने वाली मूल
सरस्वती कालांतर में एक
बरसाती नदी बनकर
रह गयी जिसमें
आज भी बरसात
के मौसम में
राजस्थान के अनूपगढ़
जिले तक जल
का विशाल प्रवाह
देखा जा सकता
है और जिसे
स्थानीय लोग सरस्वती
के अलावा घघर
हकरा आदि नामों
से भी सम्बोधित
करते रहे हैं
I सरस्वती
के सुख जाने
के बाद लोग
धीरे धीरे अन्यत्र
स्थापित हो गए
और मूल इलाका
रेगिस्तान में परिवर्तित
हो गया I आज
जब यहाँ रेगिस्तानी
इलाके में खुदाई
होती है तो
पूर्व में जलिय
क्षेत्र होने के
अत्यधिक प्रमाण मिलते हैं
तथा मछलियों और
अन्य जल आश्रित
प्राणियों के अवशेष
भी मिलते हैं
I रेगिस्तान के भीतर
वैसे स्थानों पर
जहाँ पूर्व में
सरस्वती का प्रवाह
था वहां खुदाई
करने पर आज
भी मीठा जल
उपलब्ध रहता है
जबकि बगल में
कुछ दूरी पर
खुदाई करने से
खारा जल ही
प्राप्त होता है
I रेडियो कार्बन तथा आइसोटोप
डेटिंग तकनीकों से भूमिगत
प्रवाहित जल अक्सर
४००० से ५०००
वर्ष पुराना पाया
गया है तथा
खुदाई करने पर
कुछ नीचे यमुना
और सतलुज के
तटों जैसा बालू
हिमालिय पत्थरों के साथ
पाया जाता है
जो पूर्व में
नदी के अस्तित्व
को पूर्णतः प्रमाणित
करता है I
| राखीगढ़ी |
वैदिक
काल में सप्त
सिंधु ही प्रेरणा
का मुख्य केंद्र
था जिसकी ७
नदियों यथा - १. सरस्वती,
२. शतद्रु (सतलुज),
३. पारुष्णी (रवि), ४. वितस्ता
(झेलम), ५. असिक्नी
(चेनाब), ६. विपाशा
(ब्यास) एवं ७.
सिंधु (इंडस), का अक्सर
उल्लेख ग्रंथों में मिलता
है जो अब
वैज्ञानिक तथ्यों से प्रमाणित
होता है I गंगा
और यमुना का
महत्व वैदिक काल
के पश्चात बढ़ा
जब सभय्ता सरस्वती
के सूखने के
बाद विस्थापित हो
गयी I शोधों के
अनुसार यह प्रतीत
होता है की
सतलुज नदी जो
आज सिंधु नदी
में विलीन हो
जाती है वह
पूर्व में सरस्वती
में अनेक धाराओं
में विस्तीर्ण होकर
मिलती थी जिसके
कारण उसका पुराना
नाम शतद्रु था
I शोध से यह
भी ज्ञात होता
है की पूर्व
में यमुना के
जलों का मुख्य
पर्वतीय स्रोत्र भी सरस्वती
को ही पोषित
करता था जिसके
कारण इसमें जलों
का अभाव कभी
नहीं होता था
I ३००० इसा पूर्व
के पश्चात संभवतः
किसी भूकंप के
कारण सरस्वती के
मुख्य पर्वतीय स्रोत्र
अन्यत्र परिवर्तित हो गए
और धीरे धीरे
जल का अभाव
हो गया I यमुना
का प्रवाह कालांतर
में पूर्व की
तरफ परिवर्तित हुआ
जिससे यह प्रयाग
में गंगा में
आज की तरह
विलीन होने लगी
जबकि सतलुज का
प्रवाह पश्चिम की तरफ
बदला जिससे यह
सरस्वती को छोड़
सिंधु में अपना
जल गिराने लगी
I हालाँकि इस परिवर्तन
में लगभग ८००
वर्ष लगे जिसके
कारण सरस्वती धीरे
धीरे सूखती गयी
I बाद में जब
आर्य सभय्ता मुख्य
रूप से गंगा
यमुना के मैदानी
इलाकों में बढ़ने
लगी तब भी
उनके मूल उद्गम
स्थल की स्मृतियाँ
ग्रंथों में अवशिष्ट
रहीं और तीर्थों
के माध्यम से
जीवंत बनी रहीं
I आज भारत में
अधिकांश भारतीय इन तथ्यों
से अवगत नहीं
हैं I
| राखीगढ़ी |
सरस्वती
की खोज से
भारतीय इतिहास के अनेक
रहस्यों के सुलझने
का क्रम जारी
है I सिंधु घाटी
सभय्ता को अब
सिंधु - सरस्वती सभय्ता के
रूप में जाना
जा रहा है
जिसके स्थानीय उद्गम
और विकास के
प्रमाण अब ८०००
इसा पूर्व से
मिलने लगे हैं
I हरियाणा के भिर्राना
गांव में इतिहास
के सबसे पुराने
नगर के अवशेष
प्रकाश में आएं
हैं जबकि राखीगढ़ी
की खुदाई से
लगभग ५००० इसा
पूर्व में स्थापित
उस समय के
सबसे बड़े नगर
के अवशेष प्रकाश
में आएं हैं
I सरस्वती ने भारत
में आर्यों के
इतिहास को अब
तक समझे जाने
वाले १५०० इसा
पूर्व से बहुत
पीछे यानि ३०००
इसा पूर्व के
भी पीछे धकेल
दिया है चुकी
यदि आर्य १५००
इसा पूर्व में
भारत आये होते
तो ४०० वर्ष
पूर्व सुख चुकी
नदी के पास
उनका बसना और
वैदिक ऋचाओं का
सृजन करना हास्यास्पद
लगता है और
इस समय में
किसी बड़े मानवीय
विस्थापन के प्रमाण
भी नहीं मिलते
हैं I महाभारत का
इतिहास भी अभी
तक समझे जाने
वाले समय से
१००० साल से
और अधिक पुराना
हो जा रहा
है तथा नए
रहस्यों से परदे
धीरे धीरे उठ
रहे हैं I आने
वाले समय में
हमारी जानकारी और
बढ़ेगी चुकी अनेक
स्थलों पर उत्खनन
लगातार जारी है
जो इतिहास में
नए पृष्ठ जोड़
रही है I आवश्यकता
आज इसकी है
की इतिहासविद वैज्ञानिक
दृष्टिकोण से नए
उभरते हुए तथ्यों
तथा ग्रंथों में
उल्लेखित विशेषताओं का सुक्ष्म
अध्ययन कर संभावित
तारतम्य का अवलोकन
करें I यहाँ बड़ी
चुनौती यह है
की उस काल
की लिपि आज
तक स्पष्ट पढ़ी
नहीं जा सकी
है जिससे अनेक
अनसुलझे रहस्य अभी भी
काल के गर्भ
में ही हैं
I
| बिंजौर (अनूपगढ़, राजस्थान) |
हर
स्तर पर बिना किसी
विचारधारा से प्रेरित
हुए वैज्ञानिकों तथा
इतिहासविदों को संयुक्त
और सम्मिलित प्रयास
करने की आवश्यकता
है ताकि इतिहास
के उन पृष्ठों
के ऊपर जमी
तमस दूर हो
और ज्ञान का
प्रकाश सर्वत्र फैले I हम
भी इस दिशा
में अपने स्तर
से कुछ सार्थक
प्रयास कर सकते
हैं जिससे उभरती
हुई नयी कहानी
को अच्छे से
समझ और समझा
सकें I पुराने विस्मृत ग्रंथों
का निरीक्षण नए
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किये
जाने की आवश्यकता
है और मैं
इसपर काफी समय
से सतत प्रयास
कर रहा हूँ
I जो जानकारी इस
लेख की माध्यम
से मैंने आज
आपके साथ साझा
की है उसे
हम अधिक से
अधिक लोगों तक
फैलाएं जिससे सभी का
सही दिशा में
ज्ञानवर्धन हो I इतिहास
के ये विस्मृत
पल आने वाले
भविष्य के लिए
अनेक सन्देश समेटे
हैं जिनका रहस्योद्घाटन
परम आवश्यक है
I वैदिक
संस्कृति के आधारभूत
परन्तु आज विलुप्त सरस्वती के प्रति
यही सच्ची श्रद्धांजलि
होगी I
| राखीगढ़ी |
| सरस्वती तट पर कालीबंगन में |



बहुत सारगर्भित और व्यापक दृष्टिकोण के साथ विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं में सहसंबंध स्थापित करते हुए नदीतमा सरस्वती पर यह विस्तृत आलेख सभी को पढ़नी चाहिए।
ReplyDeleteसरस्वती को समझने की दिशा में निश्चित तौर पर एक सार्थक और श्लाघ्य पहल..! आजतक सरस्वती नदी के उद्भव और अस्तित्व को लेकर जितने मुँह और उतनी बाते के रूप में अपनी-अपनी विचारधाराओं को परोसा गया है। सरस्वती नदी के पूरे इतिहास को भौतिक काल-चक्र के साथ, बड़ी गहनता से उल्लेखित किया है विकास वैभव जी ने..!आधिकारिक कार्य-संलग्नता के साथ ही,किसी भी गम्भीर मुद्दे को इतनी गहनता और विश्लेषित रूप से जनमानस में उतारना, एक सुखदता का अहसास तो देता है है।
ReplyDeleteशोधकर्ताओ और इतिहास को समझने के इच्छुक जिज्ञासुओं के लिए, यह शोध-आलेख एक महत्वपूर्ण}दस्तावेज बने, शुभेक्षाये..💐😊
Regards :)
Delete
Deleteजी भईया आप ने बिलकुल सही कहा। आप की और विकास वैभव सर के विचारो को पढ़ के मन महो महो हो गया भईया 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏
bahut khoob likha hai sir...knowledgeable...
ReplyDeleteGreat inside in our own history...well researhed n compiled article...big cheers for the writer :)
ReplyDeleteGreat inside in our own history...well researhed n compiled article...big cheers for the writer :)
ReplyDeleteबहुत बेजोड़ लेख सर, पढके मन प्रसन्नचित हो गया !!
ReplyDeleteजानकारी अति रोचक है।आज की पीढ़ी के लिए ये जानना बहुत मुश्किल होता है ऐतिहासिक धरोहर के बारे में।सब से रोचक सरस्वती नदी के नामो के बारे में पढ़ कर लगा।घाघर ओर अखरा ये पहली बार पढ़ने को मिला। ये पहल ओर हमसब के बीच इसे लेन के लिए बहुत बहुत सुक्रिया ओर बधाई।
ReplyDeleteAmazing and interesting fact of River saraswati you have presented here is an outstanding work sir, it's beyond my imagination its ultimate!! once I start reading it I got very interest to gather the relevant fact of river saraswati . Although the picture shared here describe upto what level you did this exercise to reach it to us. Beautiful work sir. ..Shared the same to all my family and friends. Who were regular follower of your post like me. Great sir! !
ReplyDeleteसरस्वती नदी के संबंध में इस सारगर्भित लेख में ऐतिहासिकता;वैज्ञानिकता;तथ्यताम्कता;रोचकता का जो समनव्य दिखा वह हम सभी के लिए ज्ञानवद्धॅन के साथ साथ सरस्वती नदी के संबंध में कई जिज्ञासाओं को को शांत करते हुए, हम सभी के दिलों में सरस्वती नदी के प्रति श्रद्धा और सम्मान में पहले से अधिक स्थान बना लिया है ।इसके अलावा इतिहास के प्रति हमारी जिज्ञासा को और बढ़ाती हैं ।हम सभी इस लेख और ज्ञानवधॅक जानकारी के लिए आपका आभार प्रकट करता हूँ ।हमें यह उम्मीद है कि आपके
ReplyDeleteइस तरह के ऐतिहासिक लेख द्वारा हमें इतिहास के प्रति सम्मान और गवॅ की भावना के साथ साथ अपनत्व का विकास हो सके।
Thanks for your comments. Regards
DeleteWell researched article sir
ReplyDeleteExcellent write up and analysis sir..it definitely raises our interest in our own ancient history...
ReplyDeleteRegards
सरस्वती नदी के अस्तित्व की तथ्यपरक और ऐतिहासिक जानकारियाँ आपके इस आलेख से प्राप्त हुई। सरस्वती नदी कोई किवदंती नहीं वास्तव में हमारी नदी थी इसकी प्रमाणिकता है।
ReplyDeleteबेहतरीन संकलन
सार्थक और सराहनीय पोस्ट
ReplyDeleteकाश
अतिसुंदर वर्णन
ReplyDeleteअद्भुत खोज।
ReplyDeleteतथ्यपरक एवं सारगर्भित।
बहुसंख्यक जनों के लिए हिंदी भाषा में silent pages एक अनुपम उपहार है।
सरस्वती नदी का विस्तृत शोध यह दर्शाता है की भारत का ईतिहास की गहराई को समझने मे हमे वैज्ञानिक माघ्यम का ऊप्योग दृढ़ता से करना चाहिए। यह शोध ईतिहास के महत्वपूर्ण वृत्तांत को उजागर करता है। बहुत बढ़िया लेख सर।
ReplyDeleteसिंधु घाटी सभ्यता की जानकारी हासिल करना भारतीय इतिहास को जानने की दिशा में पहली सीढ़ी है। अपने अध्ययन काल मे इस सभ्यता से जुड़ी बातों को हैरान करने वाला पाया। आपके आलेख से कई स्मृतियां जीवंत हो गयी। कई नए तथ्यों और नए दृष्टिकोणों से साक्षात्कार हुआ। सरस्वती सिंधु सभ्यता इस सभ्यता का उचित नाम है ऐसी मेरी भी मान्यता रही है। परंतु मेरी मान्यता भावना पर आधारित थी। भावनात्मक दृष्टि को वैज्ञानिकता का सहारा मिलना भी अद्भुत ही है। आपके वैज्ञानिक तथ्यों ने, आपकी लेखन शैली ने और आपके इस निष्काम काम ने अद्भुत मानसिक सुख दिया। ऐसे प्रशंशनीय कार्य के लिए कितना धन्यवाद दूँ समझ नही पाता........
ReplyDeleteपुनश्च: हिंदी में ब्लॉग की शरुआत करने का आग्रह भी पुराना था। आपने उन आग्रहों का मान रखा इसके लिए भी बहुत बहुत धन्यवाद। ये ब्लॉग आने वाले समय मे एक कीमती धरोहर सिद्ध हों ऐसी शुभकामना भी..
ReplyDeleteAbhi ish mamle me kisi niskarsh per paguchna haldibaazi hogi. Different views aa rahe hai
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteThank You Vikas Jee for being kind enough to share with us the knowledge which you have acquired through sheer hard work and devotion to this great cause of making Indians proud of, and realise, what we are, by knitting together the threads of the rich heritage that we have inherited from our ancestors. More power to you!!!
ReplyDeleteपढ़ा बहुत है
ReplyDeleteआपका शोध प्रशंसनीय है!
पढ़ा बहुत है
ReplyDeleteआपका शोध प्रशंसनीय है!
सरस्वती नदी का जो विश्लेषण इतने गहराई से जो किया गया है, उसे पढऩे के बाद मन में अनेक सवालों का घेरा है? इतिहास से लेकर आज के नवीनतम युग में क्या स्थितियां है, वो इस #मूक साक्षी के द्वारा स्पष्ट है। इसमें जो तस्वीरें समाहित की गई है, उससे अनेक तथ्यों को आसानी से आकलन किया जा सकता है। इतनी स्पष्टता के साथ विश्लेषण हेतु धन्यवाद सर क्योंकि इससे हमलोगों को इतिहास से जुड़ी अन्य रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारियां हासिल करने में बहुत मदद मिलेगी!!
ReplyDeleteबहुत बढ़िया कोशिश। इतिहास को बताने एवं सिखाने का अति उत्तम प्रयास।
ReplyDeleteप्रेरणास्रोत के चरण कमल में सादर प्रणाम
ReplyDeleteअद्भुत एवं रोचक जानकारियां के लिए अग्रज तुल्यय बंधुवर को साधुवाद
ReplyDeleteबहुत ही महत्वपूर्ण इतिहासिक लेख ।
ReplyDeleteइसके माध्यम से मैंने सरस्वती नदी माता के बारे में अनेक महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की ।
मैं इस लेख के लेखक को कोटि कोटि प्रणाम करता हूँ ।
जय हिन्द सर 🙏🇮🇳