Saturday, 9 May 2020

10 मई, 1857 का वह ऐतिहासिक रविवार !

10 मई, 1857, मेरठ का स्मरण एवं ऐतिहासिक चिंतन !

10 मई के आगमन पर रविवार होने के कारण यात्री मन सन् 1857 की उस तिथि का स्मरण कर रहा है जब संयोगवश रविवार ही था परंतु वर्तमान काल से तत्कालीन परिस्थितियां अत्यंत भिन्न थीं । इस तिथि का स्मरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है चूंकि इसी दिन मेरठ की सैन्य छावनी में निवास कर रहे तत्कालीन भारतीय वीर योद्धाओं ने राष्ट्रीय स्वाभिमान की अंतर्ज्योति से प्रेरणा ग्रहण करके भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित विद्रोह के प्रखर स्वरों के साथ स्वातंत्र्य समर का उद्घोष कर दिया था । हालांकि राष्ट्रीय स्वाभिमान के उत्कर्ष रूपी 1857 के उस सशक्त समर के प्रथम संकेत 29 मार्च को ही बंगाल की बैरकपुर सैन्य छावनी में अमर योद्धा मंगल पांडे के साहसिक कृत्यों तथा तत्पश्चात् 8 अप्रैल को समर्पित अविस्मरणीय सर्वोच्च बलिदान से स्पष्ट हो चुके थे परंतु संपूर्ण योजना में समाहित आश्चर्यजनक गोपनीयता की अद्भुत विशेषता यही रही थी कि तत्कालीन अंग्रेजी शासन को मेरठ के शंखनाद के पूर्व किंचित् भी उसकी भनक तक नहीं लग सकी थी ।

यदि उस काल के इतिहास का गहन अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट संकेत दर्शित होते हैं कि बैरकपुर में समर्पित सर्वोच्च बलिदान ने अंग्रेजी शासन के अधीन उनकी सेना में कार्यरत सभी भारतीय सिपाहियों के स्वाभिमानी अंतराग्नि को निश्चित रूप से अत्यंत प्रज्ज्वलित कर दिया था । विद्रोह की इच्छा हर मन में थी परंतु संगठित विद्रोह करने पर ही सफलता प्राप्त होने के कारण उचित समय की प्रतीक्षा की जा रही थी । कानपुर के समीप ब्रह्मावर्त (बिठूर) में निवास कर रहे मराठा सरदार नाना साहब पेशवा तथा दिल्ली एवं लखनऊ की गुप्त समितियों में मंत्रणा के पश्चात 31 मई को संगठित संपूर्ण विद्रोह हेतु निर्धारित किया गया था चूंकि यह सर्वविदित था कि भीषण गर्मी में अंग्रेजी सेना पर भारतीय सैनिकों के अकस्मात् तीव्र प्रहार से विजय की संभावनाएं अत्यधिक होंगी और उस परिस्थिति में भारत से अंग्रेजी शासन को निर्मूल किया जा सकता था । योजना के संबंध में सूचनाएं रोटी एवं अनेक सांकेतिक माध्यमों से केवल सभी सैन्य छावनियों तक ही नही अपितु उनके मार्गों में पड़ने वाले ग्रामों में भी पहुँचाई जा रही थी तथा व्यापक राष्ट्रीय जनक्रांति की भावना को जन्म दिया जा रहा था ।

1757 में प्लासी के युद्ध के पश्चात स्थापित अंग्रेजी शासन के 100 वर्षों के पश्चात निर्मूलन की चर्चा जब आम जनमानस में होने लगी थी, तभी विद्रोह के योजना की निर्धारित तिथि की व्यापक जानकारी होने पर भी और बैरकपुर की घटना के पश्चात भी कई स्थानों पर कुछ ऐसी परिस्थितियों की उत्पत्ति हुई जिनके कारण विद्रोह की आशंकाएं स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होने लगीं तथा जिनके नियंत्रण हेतु अंग्रेजों द्वारा निरोधात्मक कार्यवाही भी की जाने लगी । इसी क्रम में जहाँ अंबाला में 3 मई को विद्रोह की आशंका पर एक पलटन को तोपखाने की मार में हेनरी लाॅरेंस ने खड़ा कर निःशस्त्र कर दिया, वहीं मेरठ में नए कारतूसों (जिनके संदर्भ मे यह सर्वविदित था कि उनपर गाय अथवा सूअर की चर्बी लगी थी और जिनके प्रयोग हेतु बाध्य किए जाने की संभावना के कारण सर्वत्रं विद्रोही स्वर अत्यंत प्रबल हो रहे थे) के संबंध में सिपाहियों की राय जानने हेतु अंग्रेजों द्वारा कुटिल प्रयोग रूप में 6 मई को घुड़सवारों की एक टुकड़ी को उन्हें देने का निर्णय लिया गया । परंतु काल की विडंबना ऐसी हुई कि परेड पर उपस्थित 90 घुड़सवारों में से 85 ने बार-बार कहे जाने पर भी उनका स्पर्श करना अस्वीकृत कर दिया और सभी अपने-अपने बैरकों की ओर प्रस्थान कर गए । जनरल के कानों तक बात पहुंचने पर उसने कोर्ट मार्शल के सामने सभी सिपाहियों को खड़ा किया तथा सभी 85 घुड़सवारों हेतु 8 से 10 वर्ष के सश्रम कारावास रूपी दंड की घोषणा कर दी ।

1857 के निर्धारित तिथि के पूर्व मेरठ में घटित विद्रोह के तात्कालिक कारणों की समीक्षा करने पर छावनी में तत्पश्चात 9 मई को घटित हुई उस हृदयविदारक घटना का स्मरण आता है जब उन सभी 85 सिपाहियों को यूरोपियन कंपनी एवं तोपखाने की मार के पहरे में ऊँचाई पर खड़ा किया गया था और शेष नेटिव सिपाहियों को तमाशा देखने हेतु जान-बूझकर बुलाया गया था । प्रक्रिया के क्रम में तब सैन्य अनुशासन में उनके शस्त्रों को छीन कर वस्त्रों को उतारने हेतु आदेशित किया गया था जिसके पश्चात उनके हाथों एवं पैरों में भारी बेड़ियाँ पहना दी गईं । इस दृश्य को देखकर सभी भारतीय सिपाहियों का स्वाभिमान अचानक प्रबल रूप में जागृत हो उठा परंतु अपने साथियों को कारावास की ओर जाते देख वे आंतरिक वेदना सहते हुए भी बुझे मन से अपने बैरकों की ओर लौटने लगे । संध्या में जब सिपाही बाजार की तरफ गए तब सर्वत्र इसी अपमान की चर्चा हो रही थी तथा यहां तक कि महिलाओं द्वारा भी तिरस्कार की भावनाओं से सराबोर शब्दों से ही सिपाहियों का अभिवादन किया गया । पहले से ही द्रवित सिपाहियों पर इसका अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ा तथा उस पूरी रात संपूर्ण छावनी में गुप्त बैठकें चलती रहीं जिसमें मूल प्रश्न यही था कि क्या ऐसी परिस्थिति में भी 31 मई तक प्रतीक्षा करनी चाहिए और क्या तब तक नामर्दों की तरह फिरंगी दासता में घुटते रहना चाहिए ? तब सभाओं में सामूहिक मंत्रणा पर ऐसा विचार उत्पन्न होने लगा कि 10 मई, 1857 को रविवार था और सूर्यास्त के पूर्व सभी कैदी सिपाही बंधुओं की मुक्ति कराकर उन्हें सामूहिक रूप में दिल्ली की ओर प्रस्थान कर जाना चाहिए ।

10 मई, 1857 को पूरे दिन मेरठ छावनी में अजीब सी शांति के मध्य सिपाहियों में द्वंद्व यही चल रहा था कि फिरंगियों की संपूर्ण अथवा सांकेतिक हत्या की जाए ? अंततः निष्कर्ष यही निकला कि जो भी जैसा भी फिरंगी मिले उसे अंतोगति प्राप्त करा दी जाए । इसी क्रम में पास-पड़ोस के ग्रामों से भी सहस्त्रों ग्रामीण अनेक प्रकार के शस्त्रों के साथ छावनी के समीप एकत्रित हो गए थे । संध्या 5 बजे जब छावनी के चर्च का घंटा उस वातावरण में बजने लगा तब सभी अंग्रेज अपने परिवारों के साथ हंसते खेलते चर्च की ओर जाने लगे । उधर सिपाहियों की लाईन में एक ही धव्नि प्रारंभ हो रही थी 'मारो फिरंगी को !', जिसकी गर्जना शनैः शनैः प्रबलता धारण करने लगी थी । सिपाहियों द्वारा सर्वप्रथम कारावास से सभी 85 बंधुओं को मुक्त कराया गया और फिर कर्नल फिनीस से प्रारंभ अंग्रेजों के रक्तपात ने अत्यंत प्रचंड रूप धारण कर लिया जिसे सिपाहियों के दिल्ली की ओर प्रस्थान करने पर भी मेरठ के स्थानीय लोगों द्वारा पूर्णता प्रदत्त करने का संपूर्ण प्रयास किया गया । तब अकस्मात् हुए आक्रमण से मेरठ की शेष अंग्रेजी सेना इतना भयभीत हो उठी कि उनके द्वारा दिल्ली जा रहे विद्रोहियों का पीछा करने का प्रयत्न भी नहीं किया गया ।

तत्पश्चात अगले दिन प्रातः काल से ही मेरठ के स्वातंत्र्यवीर यमुना पार कर दिल्ली के लाल किले में प्रविष्ट हो गए और तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने नयी परिस्थितियों के कारण 31 मई तक प्रतीक्षा नहीं करते हुए स्वातंत्र्य की घोषणा कर दी तथा दिल्ली में भी अत्यधिक रक्तपात के साथ अंग्रेजी शासन के प्रतीकों को सर्वथा नष्ट कर दिया । मेरठ से प्रारंभ उस प्रचंड आग्नेय प्रकाश ने शीघ्र दावानल का स्वरूप धारण करना प्रारंभ कर दिया जिसने संपूर्ण उत्तर एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी सत्ता के आधार को न केवल चुनौती दी अपितु कई स्थानों पर लगभग 1 वर्ष तक स्वाहा भी कर दिया । परंतु अंततः 1857 की क्रांति अपनी योजना के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकी और लगभग एक वर्ष तक अत्यधिक संघर्ष के पश्चात दिल्ली, कानपुर, झांसी, जगदीशपुर समेत सभी स्थानों पर अंग्रेजी शासन ने स्थिरता पुनः प्राप्त कर लिया ।

1857 का शेष क्रम इतिहास के गर्भ में समाहित है परंतु मन में आज भी यह प्रश्न अवश्य विद्यमान है कि यदि समय के पूर्व 10 मई को ही मेरठ में स्वतः स्फूर्त विद्रोह के स्वर नहीं फूटे होते और गोपनीय रूप से निर्धारित 31 मई को ही सभी स्थानों पर एक साथ विद्रोह प्रस्फुटित हुआ होता तो क्या इतिहास किसी अन्य स्वरूप में विद्यमान रहा होता ? प्रश्न के उत्तर अनेक हो सकते हैं परंतु निश्चित ही मेरठ में उतपन्न अकस्मात् विद्रोह से गुप्त रूप से निर्धारित व्यापक योजना समय के पूर्व ही लघु स्वरूप में स्पष्ट हो गई जिसके कारण अंग्रेजों को सतर्क होने का कुछ अवसर अवश्य मिल गया और अंततः अत्यधिक क्रांतिवीरों के बलिदान के पश्चात भी इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी ! मेरठ में उस दिवस को घटित घटनाओं के साथ-साथ किसी भी संगठित योजना के प्रतिपादन के संदर्भ में सफलता हेतु धैर्य की आवश्यकता का स्मरण आवश्यक है ! इतिहास से प्रेरित चिंतन आवश्यक है !

Monday, 4 September 2017

अंग में गंगा से वार्ता

अंग में गंगा से वार्ता


आज प्रातः काल उठने के तुरंत बाद से ही गंगा से फिर वार्तालाप करने का मन कर रहा था । चूंकि भागलपुर में गंगा मेरे निवास से ज्यादा दूर नहीं है और आज रविवार का दिन भी था, अतः कार्यव्यस्तता के बीच कुछ पल चिंतन हेतु निकालने की इच्छा लिए चल पड़ा गंगा किनारे । गंगा किनारे पहुंचने पर भारत के सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण बिंदु रही इस सरिता से अपने व्यक्तिगत जुड़ाव के बारे में भी मन स्मरणशील हो उठता है। गंगा से कुछ ही दूरी पर बसे मेरे पैतृक ग्राम बीहट (बृहत्, बेगुसराय) के निवासीयों के जीवन के हर महत्वपूर्ण कर्म में गंगा पूजन की परंपरा रही है और पूर्वजों की अंत्येष्टि भी सिमरिया के घाटों पर सदियों से होती रही है । ऐसे में गंगा से एक अंतरंग संबंध तो जन्म के कुछ महीनों पश्चात ही मुंडन संस्कार के समय गंगा में पहली डुबकी लगाने के साथ स्थापित हो जाता है । फिर जीवनपर्यन्त प्रातः काल हर गृह में स्नान करते हुए व्यक्तियों द्वारा उच्चारित एवं गर्जित "हर हर गंगे" की ध्वनि मन में सदैव गूंजती रहती है । 





वैसे तो मैं जन्म के लगभग एक वर्ष बाद ही गंगा किनारे से तब दूर हो गया था जब पिताजी गुवाहाटी रिफाईनरी में पदस्थापित हो गए थे और इसके कारण मन आज गंगा के साथ साथ ब्रह्मपुत्र के किनारे भी घटित बाल्यकाल की स्मृतियों को संजोये है, पर जब छह वर्षों का हुआ तब पुनः गंगा ने मानो अपने समीप फिर बुला लिया था और पिताजी बरौनी रिफाईनरी में 1986 से 1993 तक पदस्थापित रहे । इसके बाद गंगा के समीप पिताजी का पदस्थापन बरौनी में पुनः 1998 से 2001 के बीच रहा जब मैं गंगा के निकट ही आई आई टी कानपुर में अपनी पढाई कर रहा था । 

कानपुर में पढाई के दौरान ही गंगा के बिठूर घाट पर नियमित रूप से समय मिलने पर जाने लगा था और गंगा से वार्तालाप करने का प्रयास करते घंटों ध्रुव टीले पर बैठे मन चिंतन में डूब जाता था। बिठूर में ही बैठे बैठे कभी पूर्ववर्ती ऋषियों की कल्पना करता तो कभी भारत के इतिहास और भविष्य के बारे में चिंतन करता । बिठूर में जहाँ अनेक धार्मिक एवं पौराणिक स्थल सदियों से उपासना के केंद्रों के रूप में प्रेरित करते थे, वहीँ 1857 की क्रांति के अवशेष नाना साहब और तात्या तोपे जैसे राष्ट्रभक्तों की याद दिला जीवन में कुछ सार्थक योगदान समर्पित करने के निमित्त मन को उद्वेलित करते थे । 

पुलिस सेवा में आने के बाद एक आई पी एस प्रशिक्षु के रूप में पुलिसिंग भी मैंने गंगा किनारे अवस्थित भागलपुर जिले में ही सीखी जहाँ तीन माह तक मैं कहलगाँव का थानाध्य्क्ष भी रहा । पुलिस अधीक्षक के रूप में भी शुरूआत पाटलिपुत्र में गंगा किनारे स्थित कार्यालय से ही हुई और वहाँ से बगहा रातोंरात स्थानांतरित होने पर यात्रा के क्रम में गंगा से हुई वार्ता मानस पटल पर अंकित हो गई । फिर 2015 से लगातार पटना और मई 2017 से भागलपुर में गंगा के साथ अनेक पड़ावों पर समय और गंगा के नित्य प्रवाह में वार्ता यात्रा के क्रम में जारी है । इसी क्रम में आज अंग प्रदेश में विक्रमशिला सेतु के निकट गंगा से वार्ता करने की इच्छा लिए रविवार को सार्थक करना चाहता था ।

उत्तर तथा दक्षिणी बिहार को जोड़ती विक्रमशिला सेतु के समीप वर्षा ऋतु में बृहत् रूप धारण किए गंगा की तीव्र धाराएं पूर्ववर्ती शुष्क क्षेत्रों को भी पुनः आद्र एवं प्लावित करती हुई समुद्र की ओर सतत् गतिशील रहती हैं । यहाँ किनारे बैठकर धाराओं के तीव्र प्रवाह को देखते देखते मन अंग प्रदेश तथा बिहार के इतिहास और भविष्य के चिंतन में लीन हो जाता है । एक तरफ जहाँ महाभारत में अंग प्रदेश को महारथी कर्ण के राज्य के रूप में वर्णित किया गया है, वहीं कर्ण के जन्म के साथ ही हस्तिनापुर से अंग की राजधानी चंपा की यात्रा का माध्यम बनी गंगा से उनके जीवनपर्यन्त बने रहे संबंध की अवधारणा भी स्पष्ट है । गंगा के किनारे ही अंगराज की दिनचर्या प्रारंभ होती थी जिसने दानवीर के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करते भी संभवतः देखा होगा ।

चंपा जिसे ग्रंथों तथा पुराणों में विश्व का प्रथम नगर भी कहा गया है, उसके निवासीयों ने कर्ण की स्मृतियों को परंपरागत रूप में संजोए रखा और अवशेषों के रूप में कर्णगढ आज भी अनेक ऐतिहासिक रहस्यों को समाहित रखे हुए है । चंपानगर के अवशेषों के ऊपर आज अंग्रेजों द्वारा लगभग 110 वर्ष पूर्व स्थापित सिपाही प्रशिक्षण विद्यालय, नाथनगर है, जिसमें कहीं भी नए भवनों के निर्माण अथवा पुराने भवनों के मरम्मत के निमित्त उत्खनन होने पर प्राचीन चंपा के अवशेष निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं । 1969 से 1983 के बीच प्रायोगिक (ट्रायल) उत्खननों में प्राचार्य निवास के निकट छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक के अनेक नगरीय अवशेष प्राप्त हुए थे । भागलपुर शहर से चंपानगर की ओर बढने पर ऐसा अवश्य प्रतीत होता है मानो आप एक पुरानी सभ्यता के केंद्र की ओर यात्रा कर रहे हो चूंकि मार्ग में आगे बढती हुई ऊँचाई स्पष्ट दिखते हुए बगल के टीलों से पुरातन अवशेषों की झलकियाँ भी दिखाती है । गंगा के उत्तरी छोर से इसे स्पष्ट देखा जा सकता है । 

चंपा के प्रारंभिक इतिहास का वर्णन अनेक बौद्ध ग्रंथों में मिलता है जहाँ इसके एक बड़े और सामर्थ्यशाली जनपद जिसमें बौद्ध धर्म स्थापित हो चुका था का रूप उभरता है । 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वैनसांग द्वारा भी चंपा को जहाँ समृद्ध और ऐतिहासिक अवशेषों से परिपूर्ण पाया गया था वहीं वर्तमान भागलपुर के घाटों पर घना जंगल भी स्थापित पाया था जिसके अवशेष अभी भी बरारी में महसूस किये जा सकते हैं । आज भी यहाँ कुप्पाघाट के रूप में प्रसिद्ध गंगा तट पर भूमिगत गुफा अपने सदियों पुराने इतिहास के रहस्यों को समेटे हुए है ।
गंगा तट पर जब वर्तमान समय की दशा और दिशा के बारे में सोचने लगा तब अंग क्षेत्र में फैले विशाल ऐतिहासिक अवशेषें पूर्व विरासत की याद दिलाने लगे । मन उस काल की कल्पना करने लगा जब सैकड़ों वर्ष पूर्व शिल्पियों ने गंगा तट पर सुंदर मूर्तियाँ जहंगीरा (सुल्तानगंज), पत्थरघटा (बटेश्वरस्थान)आदि स्थानों पर उकेरते हुए गंगा के बीचों बीच कहलगांव और जहंगीरा के द्वीपों पर विशाल देवायत्तन स्थापित किए थे । विक्रमशिला विश्वविद्यालय की पूर्व में प्रसिद्धि के बारे में जब मन सोचने लगा तब गंगा से वार्तालाप करने की फिर इच्छा हुई और मन कहने लगा कि मातृसंज्ञा से विभूषित एवं सदियों से भारतीयों द्वारा तीर्थरूप में पूजित हे देवी सरिते ! तुमने हिमालय से समुद्रपर्यन्त अपने सतत् प्रवाह में इस क्षेत्र में इतिहास के प्रवाह को भी निकट से अवश्य देखा होगा । अवश्य ही तुम्हारी तटों पर जहाँ तुमने अनेकों ऋषियों और दार्शनिकों को चिंतन करते देखा होगा वहीं कालांतर में अनेक राजवंशों तथा नगरों का उत्थान एवं पतन भी देखा होगा । तुमने ऐतिहासिक हस्तिनापुर, प्रयाग, काशी, पाटलिपुत्र, कृमिला, मोदागिरी और चंपा में जहाँ सभ्यता का उत्कर्ष देखा होगा वहीं उनके पतन की मूक साक्षी बन कारणों पर अवश्य चिंतन और विश्लेषण किया होगा । 

ऐसे में इस युग में जन्मा यह भारत पुत्र ऐतिहासिक बिहार की अंग भूमि पर विद्यमान होकर प्रश्न करना चाहता है कि आखिर पूर्वकाल में अत्यंत समृद्ध रहा बिहार का यह विशाल क्षेत्र क्यों आज विश्व के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता है । स्मरण करने पर दो से ढाई सहस्र वर्ष पूर्व के बिहार का वह काल चिंतन के लिए विवश करते हुए अपने आप में प्रेरित भी करता है चुकि उस काल में जब संचार के संसाधनों का घोर अभाव था और आवागमन के मार्ग भी सुगम नहीं थे तब इसी क्षेत्र ने संपूर्ण भारतवर्ष को एकत्रित कर कुशल नेतृत्व प्रदान किया था । तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मेगास्थनीज तथा अन्य लेखकों ने तो हमारे पाटलिपुत्र को तब के संसार के सर्वोतम नगर के रूप में वर्णित भी किया था और यहाँ की अनुपम सभ्यता और संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण की थी । फिर कालांतर में भला ऐसे कौन से कारण रहे जो वर्तमान स्थिति के जन्मदायक बने और ऐसा क्यों है कि आज जब मानव सभ्यता अतितीव्र विकास कर रही है जिससे बिहार का यह क्षेत्र भी अछूता नहीं है और आगे बढ रहा है, वहीँ अन्य की अपेक्षा यहाँ गति कुछ मधम सी प्रतीत होती दिखती है । 

गंगा से वार्तालाप के क्रम में सोचते सोचते अनेक कारण मन में उभरे जो वर्तमान परिस्थितियों के बीजरूप में इतिहास पटल पर अंकित होते गए जिसमें अनेकों इतिहास एवं कालजनित विसंगतियां यथा जातिवाद, सम्प्रदायवाद, लिंगभेद इत्यादि से आधुनिक बिहारी समाज आज भी जूझ रहा है और जिनके अवरोधों से आगे निकलने पर ही समग्र विकास अत्यंत गतिशील रूप लेता प्रतीत होता है । गंगा मानो यह कह रही थी कि समयांतर में परिस्थितियों में बहुत कुछ परिवर्तित होने पर भी उज्जवल भविष्य की विशाल संभावनाएं क्षीण नहीं हैं । यदि कालांतर में परिवर्तन हुआ है तो उसका कारण संकीर्ण होती गई मानसिकता ही है । उत्कर्ष के मूल तत्व तो आज भी वैसे ही हैं जैसे तब थे और उत्कृष्ट प्रतिभा की भी पूर्व की भांति ही कमी नहीं है । 

जिस भूमि ने कभी याज्ञवल्क्य, मैत्रैयी, जनक, चाणक्य और आर्यभट्ट जैसे विद्वानों को ज्ञान अर्जित करते देखा था उसकी संतानें आज भी देश और विदेशों में अपनी ज्ञानपूर्ण उपलब्धियों की पताका लहरा रहे हैं और भूमि को गौरवान्वित कर रहे हैं । समस्या तो इसलिए है चूंकि वर्तमान पीढ़ी की असीम ऊर्जाओं का संचालन सकारात्मक दिशा में न होकर पतनशीलता ग्रहण करने को आतुर है । समाज का जो विकसित वर्ग पूर्व में व्यक्ति से व्यक्ति और व्यक्ति से समाज को परस्पर जोड़कर समाज के उत्थान के निमित्त प्रयासरत रहता था वही आज जोड़-तोड़ और विभाजन की नीतियों पर चलकर न तो अपना और न ही समाज का विकास कर पा रहा है । अधिकांशतः अनेक शिक्षित एवं संपन्न बिहारवासी यहाँ की समस्याओं को देखकर बिहार के बाहर अनेकानेक क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं और सम्मिलित भविष्य की चिंता छद्म होती जा रही है । 

गंगा मूक साक्षी बन देखती रही है, परंतु अपने विशाल तटों पर पूर्व कृतियों की यादें समेटे युवा वर्ग के लिए संदेश रखे है । वार्ता करने पर यह बताने को प्रयासरत है कि परिवर्तन के निमित्त आवश्यकता है एक आवाह्न और संगठन की जो आगे चलकर एक वैचारिक और सामाजिक क्रान्ति का रूप लेकर विकास को अवरोधों से मुक्त गति दे सके । इसमें मुख्य सहभागिता का दायित्व युवा वर्ग के कंधों पर ही है चूंकि बिहार का अतीत प्रेरित करते हुए जहाँ वर्तमान के बारे में चिंतित करता है, वहीँ अनिश्चित के गर्भ में प्रतीक्षा करता भविष्य आने वाली पीढ़ीयो को भी पूर्णतः प्रभावित करेगा । युवा पीढ़ी के लिए यह समझना आवश्यक है कि अनिश्चित भविष्य हमारी वर्तमान कृतियों पर निर्भर है और सभी से अपनी नियमित दिनचर्या के अतिरिक्त कुछ आंशिक ही सही परंतु निरंतर योगदान की अपेक्षा रखता है । गंगा मानो यह पूछती है कि क्या बिहार का युवा वर्ग इस चुनौती और परिवर्तन के लिए तैयार है ? 


गंगा किनारे #यात्री_मन चिंतन में डूबा है और इतिहास से प्रेरित परंतु उससे भी बृहत् एक अत्यंत उज्जवल भविष्य के नवनिर्माण की कल्पना लिए हुए है ।

 

Wednesday, 19 April 2017

सरस्वती की प्रतिध्वनि



सरस्वती की प्रतिध्वनि !

सदियों पूर्व विलुप्त हुई सरस्वती नदी के पूर्ववर्ती विशाल तटों पर फैले पुरातन भग्नावशेष आज भी एक मूक परन्तु गंभीर सी प्रतिध्वनि सतत संचारित करते हैं जिसमें भारतीय इतिहास के अनेक अनसुलझे रहस्य समाहित हैं I जब भी मैं उन भग्नावशेषों के पास कभी रुकता हूँ और सोचता हूँ तो मन एक अत्यंत गंभीर चिंतन में समाहित हो जाता है और ऐसा प्रतीत होता है मानो पुरातन काल की अनेक विस्मृत कहानियां कुछ नया रहस्योद्घाटन करना चाहती हों जिससे हमारे बीते हुए इतिहास को नवीन दृष्टिकोण से समझा जा सके I वास्तव में यदि हम भारतीय इतिहास के वर्तमान ज्ञान को देखें तो हम पाएंगे की आज की हमारी जो भी समझ हैं वह पिछले लगभग २०० से कुछ अधिक वर्षों के दौरान किये गए शोधों पर ही आधारित है I सन १७८४ में "एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल" की स्थापना के पश्चात ही औपचारिक रूप से भारतीय इतिहास के अनेक पहलुओं का दस्तावेजीकरण प्रारम्भ हुआ और अथक परिश्रम तथा समय बीतने के साथ अनेक नए तथ्य प्रकाश में आते गए जो सदियों पूर्व विस्मृत हो चुके थे I इस प्रारंभिक समय के सबसे महत्वपूर्ण खोजों की अगर हम चर्चा करें तो जेम्स प्रिन्सेप द्वारा ब्राह्मी लिपि का पढ़ा जाना तथा बौद्ध दस्तावेजों के आधार पर एलेग्जेंडर कन्निंघम द्वारा अनेक ऐतिहासिक स्थलों का अध्ययन एवं उत्खनन का प्रारम्भ होना अविस्मरणीय हैं I अनेक विदेशी शोधकर्ताओं ने भारत के पुरातन ग्रंथों का अनुवाद तथा अध्ययन किया जिसमे जर्मनी के मैक्स मुएलर तथा अन्य का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा I भारतीय ज्ञानियों ने भी अपने पुरातन ग्रंथों का पुनः अवलोकन नए दृष्टिकोण से किया जिसमे महर्षि दयानन्द तथा बाल गंगाधर तिलक के कार्य अभूतपूर्व रहे I

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा बिंजौर (अनूपगढ़, राजस्थान) में सरस्वती तट पर उत्खनन के समय, फ़रवरी, २०१७


आज जब हम उन कार्यों का अवलोकन करते हैं तो उस समय के ज्ञान के आधार पर अनेक निष्कर्ष उनमे पाते हैं जिसमे समय के साथ आमूलचूल परिवर्तन हुआ है I उदाहरण के तौर पर यह सर्वज्ञात है की सिर्फ १०० वर्ष पूर्व हड़प्पा अथवा सिंधु घाटी की सभय्ता और संस्कृति के बारे में कोई भी नहीं जानता था I मैक्स मुएलर जैसे ज्ञानियों ने भारत के इतिहास को केवल १५०० इसा पूर्व के लगभग आर्यों के आगमन से प्रारम्भ माना था I कालांतर में जब मोहनजोदरो और हड़प्पा के अलावा अनेक अन्य स्थानों पर भी पुरातन भग्नावशेष मिलने लगे तो इतिहासविदों में इस संस्कृति के उद्गम तथा समापन को लेकर अनेक कल्पनाओं का जन्म हुआ जिसने इतिहास की पुस्तकों में स्थान भी पाया I विशेष रूप से जब इतिहासविदों ने भारत के मूल ग्रंथों तथा उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के अध्ययन में सामंजस्य नहीं होता पाया तब उन्होंने ग्रंथों में उल्लेखित अधिकांश तथ्यों को काल्पनिक अथवा काव्यात्मक श्रेणी में ही समझा I कुछ ऐसा ही सरस्वती नदी के साथ ही हुआ जिसको पूर्व में इतिहासकार अद्यतन जानकारी के अभाव में समझ नहीं पाए जबकि ऋग्वेद एवं प्राचीन ग्रंथों में इस नदी का "अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वती (ऋग्वेद  - .४१.१६) " के रूप में विस्तार से वर्णन किया गया था

 

वेदों में सरस्वती के तट पर उसकी प्रेरणा से ऋषियों के आश्रमों में ही अधिकांश ऋचाओं के उद्गम की बात प्रकाश में आती है I वेदों में सरस्वती को सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण नदी बताया गया है जो अत्यंत विशाल वेग के साथ हिमालय से समुद्र तक बहती थी I  महाभारत में भी सरस्वती का विस्तृत वर्णन उपलब्ध  है जिसमे इसे हिमालय से समुद्र तक बहने वाली विशाल नदी के रूप में बताया गया है और इसके तटों पर अनेकों तीर्थों तथा ऋषियों के आश्रमों का उल्लेख किया गया है I सरस्वती नदी के दक्षिण तथा दृषाद्वती के उत्तर अवस्थित क्षेत्र को ही वेदों के उद्गम स्थल तथा आर्यों की अति पवित्र पुण्यभूमि कुरुक्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है जहाँ अनेक वैदिक ऋषियों के आश्रमों तथा १०० से भी अधिक महत्वपूर्ण तीर्थों के अवस्थित होने का उल्लेख है I अपने वनवास काल में पांडवों ने अधिकांश समय सरस्वती तट पर स्थित द्वैतवन तथा काम्यकवन में व्यतीत किया था जहाँ सरस्वती में आने वाली वार्षिक बाढ़ का भी सुन्दर चित्रण किया गया है जो इसके उस काल में अगाध जल से परिपूर्ण होने का प्रमाण है I जब महाभारत का युद्ध सरस्वती के तट पर ही स्थित कुरुक्षेत्र में प्रारम्भ हुआ तब बलराम ने प्रभासक्षेत्र (गुजरात) से हिमालय तक स्थित सरस्वती के तीर्थों की यात्रा प्रारम्भ की और युद्ध की समाप्ति पर भीम और दुर्योधन के युद्ध के समय उपस्थित हुए I बलराम की तीर्थयात्रा में सरस्वती के तट पर स्थित विनाशन तीर्थ का भी उल्लेख है जहाँ कुछ दुरी के लिए सरस्वती भूमि के अंदर विलीन होकर पुनः प्रकट होती थी और जिसे आज कुछ इतिहासकार सरस्वती के धीरे धीरे विलुप्त होने के प्रमाण के रूप में भी समझने लगे हैं

 

आधुनिक विज्ञानं तथा ऐतिहासिक शोधों के कारण सदियों से विलुप्त सरस्वती आज फिर से जीवंत हो उठी है I वैज्ञानिकों के अध्ययन के आधार पर अब यह सिद्ध हो गया है की सरस्वती वास्तव में वेदों में वर्णित स्वरुप के अनुसार आज से लगभग ५००० वर्ष पहले हिमालय से समुद्र तक बहती थी I उपग्रह (सैटेलाइट) से प्राप्त चित्रों में पूर्ववर्ती सरस्वती के सभी प्रवाह मार्गों को साक्षात् देखा जा सकता है जिसमे अनेक स्थानों पर से किलो मीटर तक इसका विस्तार देखा जाता है I अनेक शोधों के पश्चात अब यह माना जा रहा है की लगभग २७०० से १९०० इसा पूर्व के बीच में कतिपय कारणों से सरस्वती धीरे धीरे विलुप्त होती चली गयी I हालांकि विलुप्त होने के बाद भी लोगों ने इसको विस्मृत नहीं होने दिया तथा पूजा अर्चना करते रहे I यहाँ तक की प्रयाग में गंगा तथा यमुना के संगम स्थल में सरस्वती के गुप्त मिलन की बात कर वहां त्रिवेणी संगम के रूप में दोनों सरिताओं के साथ सरस्वती की स्मृति को भी जीवित रखा गया

 
 
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह अत्यंत उल्लेखनीय है की हड़प्पा संस्कृति से जुड़े सबसे अधिक स्थल (६० % से ज्यादा) सरस्वती के तट पर ही पाए जाते हैं तथा नदी के सुख जाने के बाद १९०० इसा पूर्व में सप्त-सिंधु के इलाके से संस्कृति का फैलाव धीरे धीरे गंगा यमुना के मैदानी इलाकों में हुआ जो लगातार किये जा रहे उत्खननों से सिद्ध होता है I वेदों के बाद के ग्रंथों में सरस्वती को अक्सर पुराने महत्व के कारन पूज्यनीय पाया गया है परन्तु गंगा सबसे अधिक पूज्य नदी के रूप में उभरती है जिसके किनारे आज के प्रचलित हिन्दू धर्म के मुख्य तीर्थ स्थल भी विद्यमान हैं I शोधों से प्राप्त तथ्य बताते हैं की पूर्व में अदि बद्री (यमुनानगर जिला , हरियाणा) से प्रवाहित होने वाली मूल सरस्वती कालांतर में एक बरसाती नदी बनकर रह गयी जिसमें आज भी बरसात के मौसम में राजस्थान के अनूपगढ़ जिले तक जल का विशाल प्रवाह देखा जा सकता है और जिसे स्थानीय लोग सरस्वती के अलावा घघर हकरा आदि नामों से भी सम्बोधित करते रहे हैं I  सरस्वती के सुख जाने के बाद लोग धीरे धीरे अन्यत्र स्थापित हो गए और मूल इलाका रेगिस्तान में परिवर्तित हो गया I आज जब यहाँ रेगिस्तानी इलाके में खुदाई होती है तो पूर्व में जलिय क्षेत्र होने के अत्यधिक प्रमाण मिलते हैं तथा मछलियों और अन्य जल आश्रित प्राणियों के अवशेष भी मिलते हैं I रेगिस्तान के भीतर वैसे स्थानों पर जहाँ पूर्व में सरस्वती का प्रवाह था वहां खुदाई करने पर आज भी मीठा जल उपलब्ध रहता है जबकि बगल में कुछ दूरी पर खुदाई करने से खारा जल ही प्राप्त होता है I रेडियो कार्बन तथा आइसोटोप डेटिंग तकनीकों से भूमिगत प्रवाहित जल अक्सर ४००० से ५००० वर्ष पुराना पाया गया है तथा खुदाई करने पर कुछ नीचे यमुना और सतलुज के तटों जैसा बालू हिमालिय पत्थरों के साथ पाया जाता है जो पूर्व में नदी के अस्तित्व को पूर्णतः प्रमाणित करता है


राखीगढ़ी


वैदिक काल में सप्त सिंधु ही प्रेरणा का मुख्य केंद्र था जिसकी नदियों यथा - . सरस्वती, . शतद्रु (सतलुज), . पारुष्णी  (रवि), . वितस्ता (झेलम), . असिक्नी (चेनाब), . विपाशा (ब्यास) एवं . सिंधु (इंडस), का अक्सर उल्लेख ग्रंथों में मिलता है जो अब वैज्ञानिक तथ्यों से प्रमाणित होता है I गंगा और यमुना का महत्व वैदिक काल के पश्चात बढ़ा जब सभय्ता सरस्वती के सूखने के बाद विस्थापित हो गयी I शोधों के अनुसार यह प्रतीत होता है की सतलुज नदी जो आज सिंधु नदी में विलीन हो जाती है वह पूर्व में सरस्वती में अनेक धाराओं में विस्तीर्ण होकर मिलती थी जिसके कारण उसका पुराना नाम शतद्रु था I शोध से यह भी ज्ञात होता है की पूर्व में यमुना के जलों का मुख्य पर्वतीय स्रोत्र भी सरस्वती को ही पोषित करता था जिसके कारण इसमें जलों का अभाव कभी नहीं होता था I ३००० इसा पूर्व के पश्चात संभवतः किसी भूकंप के कारण सरस्वती के मुख्य पर्वतीय स्रोत्र अन्यत्र परिवर्तित हो गए और धीरे धीरे जल का अभाव हो गया I यमुना का प्रवाह कालांतर में पूर्व की तरफ परिवर्तित हुआ जिससे यह प्रयाग में गंगा में आज की तरह विलीन होने लगी जबकि सतलुज का प्रवाह पश्चिम की तरफ बदला जिससे यह सरस्वती को छोड़ सिंधु में अपना जल गिराने लगी I हालाँकि इस परिवर्तन में लगभग ८०० वर्ष लगे जिसके कारण सरस्वती धीरे धीरे सूखती गयी I बाद में जब आर्य सभय्ता मुख्य रूप से गंगा यमुना के मैदानी इलाकों में बढ़ने लगी तब भी उनके मूल उद्गम स्थल की स्मृतियाँ ग्रंथों में अवशिष्ट रहीं और तीर्थों के माध्यम से जीवंत बनी रहीं I आज भारत में अधिकांश भारतीय इन तथ्यों से अवगत नहीं हैं

राखीगढ़ी


सरस्वती की खोज से भारतीय इतिहास के अनेक रहस्यों के सुलझने का क्रम जारी है I सिंधु घाटी सभय्ता को अब सिंधु - सरस्वती सभय्ता के रूप में जाना जा रहा है जिसके स्थानीय उद्गम और विकास के प्रमाण अब ८००० इसा पूर्व से मिलने लगे हैं I हरियाणा के भिर्राना गांव में इतिहास के सबसे पुराने नगर के अवशेष प्रकाश में आएं हैं जबकि राखीगढ़ी की खुदाई से लगभग ५००० इसा पूर्व में स्थापित उस समय के सबसे बड़े नगर के अवशेष प्रकाश में आएं हैं I सरस्वती ने भारत में आर्यों के इतिहास को अब तक समझे जाने वाले १५०० इसा पूर्व से बहुत पीछे यानि ३००० इसा पूर्व के भी पीछे धकेल दिया है चुकी यदि आर्य १५०० इसा पूर्व में भारत आये होते तो ४०० वर्ष पूर्व सुख चुकी नदी के पास उनका बसना और वैदिक ऋचाओं का सृजन करना हास्यास्पद लगता है और इस समय में किसी बड़े मानवीय विस्थापन के प्रमाण भी नहीं मिलते हैं I महाभारत का इतिहास भी अभी तक समझे जाने वाले समय से १००० साल से और अधिक पुराना हो जा रहा है तथा नए रहस्यों से परदे धीरे धीरे उठ रहे हैं I आने वाले समय में हमारी जानकारी और बढ़ेगी चुकी अनेक स्थलों पर उत्खनन लगातार जारी है जो इतिहास में नए पृष्ठ जोड़ रही है I आवश्यकता आज इसकी है की इतिहासविद वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नए उभरते हुए तथ्यों तथा ग्रंथों में उल्लेखित विशेषताओं का सुक्ष्म अध्ययन कर संभावित तारतम्य का अवलोकन करें I यहाँ बड़ी चुनौती यह है की उस काल की लिपि आज तक स्पष्ट पढ़ी नहीं जा सकी है जिससे अनेक अनसुलझे रहस्य अभी भी काल के गर्भ में ही हैं

बिंजौर (अनूपगढ़, राजस्थान)




हर स्तर पर बिना किसी विचारधारा से प्रेरित हुए वैज्ञानिकों तथा इतिहासविदों को संयुक्त और सम्मिलित प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि इतिहास के उन पृष्ठों के ऊपर जमी तमस दूर हो और ज्ञान का प्रकाश सर्वत्र फैले I हम भी इस दिशा में अपने स्तर से कुछ सार्थक प्रयास कर सकते हैं जिससे उभरती हुई नयी कहानी को अच्छे से समझ और समझा सकें I पुराने विस्मृत ग्रंथों का निरीक्षण नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किये जाने की आवश्यकता है और मैं इसपर काफी समय से सतत प्रयास कर रहा हूँ I जो जानकारी इस लेख की माध्यम से मैंने आज आपके साथ साझा की है उसे हम अधिक से अधिक लोगों तक फैलाएं जिससे सभी का सही दिशा में ज्ञानवर्धन हो I इतिहास के ये विस्मृत पल आने वाले भविष्य के लिए अनेक सन्देश समेटे हैं जिनका रहस्योद्घाटन परम आवश्यक है I  वैदिक संस्कृति के आधारभूत परन्तु आज विलुप्त सरस्वती के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी I




राखीगढ़ी





सरस्वती तट पर कालीबंगन में





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10 मई, 1857, मेरठ का स्मरण एवं ऐतिहासिक चिंतन ! 10 मई के आगमन पर रविवार होने के कारण यात्री मन सन् 1857 की उस तिथि का स्मरण कर रहा है जब ...