Saturday, 9 May 2020

10 मई, 1857 का वह ऐतिहासिक रविवार !

10 मई, 1857, मेरठ का स्मरण एवं ऐतिहासिक चिंतन !

10 मई के आगमन पर रविवार होने के कारण यात्री मन सन् 1857 की उस तिथि का स्मरण कर रहा है जब संयोगवश रविवार ही था परंतु वर्तमान काल से तत्कालीन परिस्थितियां अत्यंत भिन्न थीं । इस तिथि का स्मरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है चूंकि इसी दिन मेरठ की सैन्य छावनी में निवास कर रहे तत्कालीन भारतीय वीर योद्धाओं ने राष्ट्रीय स्वाभिमान की अंतर्ज्योति से प्रेरणा ग्रहण करके भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित विद्रोह के प्रखर स्वरों के साथ स्वातंत्र्य समर का उद्घोष कर दिया था । हालांकि राष्ट्रीय स्वाभिमान के उत्कर्ष रूपी 1857 के उस सशक्त समर के प्रथम संकेत 29 मार्च को ही बंगाल की बैरकपुर सैन्य छावनी में अमर योद्धा मंगल पांडे के साहसिक कृत्यों तथा तत्पश्चात् 8 अप्रैल को समर्पित अविस्मरणीय सर्वोच्च बलिदान से स्पष्ट हो चुके थे परंतु संपूर्ण योजना में समाहित आश्चर्यजनक गोपनीयता की अद्भुत विशेषता यही रही थी कि तत्कालीन अंग्रेजी शासन को मेरठ के शंखनाद के पूर्व किंचित् भी उसकी भनक तक नहीं लग सकी थी ।

यदि उस काल के इतिहास का गहन अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट संकेत दर्शित होते हैं कि बैरकपुर में समर्पित सर्वोच्च बलिदान ने अंग्रेजी शासन के अधीन उनकी सेना में कार्यरत सभी भारतीय सिपाहियों के स्वाभिमानी अंतराग्नि को निश्चित रूप से अत्यंत प्रज्ज्वलित कर दिया था । विद्रोह की इच्छा हर मन में थी परंतु संगठित विद्रोह करने पर ही सफलता प्राप्त होने के कारण उचित समय की प्रतीक्षा की जा रही थी । कानपुर के समीप ब्रह्मावर्त (बिठूर) में निवास कर रहे मराठा सरदार नाना साहब पेशवा तथा दिल्ली एवं लखनऊ की गुप्त समितियों में मंत्रणा के पश्चात 31 मई को संगठित संपूर्ण विद्रोह हेतु निर्धारित किया गया था चूंकि यह सर्वविदित था कि भीषण गर्मी में अंग्रेजी सेना पर भारतीय सैनिकों के अकस्मात् तीव्र प्रहार से विजय की संभावनाएं अत्यधिक होंगी और उस परिस्थिति में भारत से अंग्रेजी शासन को निर्मूल किया जा सकता था । योजना के संबंध में सूचनाएं रोटी एवं अनेक सांकेतिक माध्यमों से केवल सभी सैन्य छावनियों तक ही नही अपितु उनके मार्गों में पड़ने वाले ग्रामों में भी पहुँचाई जा रही थी तथा व्यापक राष्ट्रीय जनक्रांति की भावना को जन्म दिया जा रहा था ।

1757 में प्लासी के युद्ध के पश्चात स्थापित अंग्रेजी शासन के 100 वर्षों के पश्चात निर्मूलन की चर्चा जब आम जनमानस में होने लगी थी, तभी विद्रोह के योजना की निर्धारित तिथि की व्यापक जानकारी होने पर भी और बैरकपुर की घटना के पश्चात भी कई स्थानों पर कुछ ऐसी परिस्थितियों की उत्पत्ति हुई जिनके कारण विद्रोह की आशंकाएं स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होने लगीं तथा जिनके नियंत्रण हेतु अंग्रेजों द्वारा निरोधात्मक कार्यवाही भी की जाने लगी । इसी क्रम में जहाँ अंबाला में 3 मई को विद्रोह की आशंका पर एक पलटन को तोपखाने की मार में हेनरी लाॅरेंस ने खड़ा कर निःशस्त्र कर दिया, वहीं मेरठ में नए कारतूसों (जिनके संदर्भ मे यह सर्वविदित था कि उनपर गाय अथवा सूअर की चर्बी लगी थी और जिनके प्रयोग हेतु बाध्य किए जाने की संभावना के कारण सर्वत्रं विद्रोही स्वर अत्यंत प्रबल हो रहे थे) के संबंध में सिपाहियों की राय जानने हेतु अंग्रेजों द्वारा कुटिल प्रयोग रूप में 6 मई को घुड़सवारों की एक टुकड़ी को उन्हें देने का निर्णय लिया गया । परंतु काल की विडंबना ऐसी हुई कि परेड पर उपस्थित 90 घुड़सवारों में से 85 ने बार-बार कहे जाने पर भी उनका स्पर्श करना अस्वीकृत कर दिया और सभी अपने-अपने बैरकों की ओर प्रस्थान कर गए । जनरल के कानों तक बात पहुंचने पर उसने कोर्ट मार्शल के सामने सभी सिपाहियों को खड़ा किया तथा सभी 85 घुड़सवारों हेतु 8 से 10 वर्ष के सश्रम कारावास रूपी दंड की घोषणा कर दी ।

1857 के निर्धारित तिथि के पूर्व मेरठ में घटित विद्रोह के तात्कालिक कारणों की समीक्षा करने पर छावनी में तत्पश्चात 9 मई को घटित हुई उस हृदयविदारक घटना का स्मरण आता है जब उन सभी 85 सिपाहियों को यूरोपियन कंपनी एवं तोपखाने की मार के पहरे में ऊँचाई पर खड़ा किया गया था और शेष नेटिव सिपाहियों को तमाशा देखने हेतु जान-बूझकर बुलाया गया था । प्रक्रिया के क्रम में तब सैन्य अनुशासन में उनके शस्त्रों को छीन कर वस्त्रों को उतारने हेतु आदेशित किया गया था जिसके पश्चात उनके हाथों एवं पैरों में भारी बेड़ियाँ पहना दी गईं । इस दृश्य को देखकर सभी भारतीय सिपाहियों का स्वाभिमान अचानक प्रबल रूप में जागृत हो उठा परंतु अपने साथियों को कारावास की ओर जाते देख वे आंतरिक वेदना सहते हुए भी बुझे मन से अपने बैरकों की ओर लौटने लगे । संध्या में जब सिपाही बाजार की तरफ गए तब सर्वत्र इसी अपमान की चर्चा हो रही थी तथा यहां तक कि महिलाओं द्वारा भी तिरस्कार की भावनाओं से सराबोर शब्दों से ही सिपाहियों का अभिवादन किया गया । पहले से ही द्रवित सिपाहियों पर इसका अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ा तथा उस पूरी रात संपूर्ण छावनी में गुप्त बैठकें चलती रहीं जिसमें मूल प्रश्न यही था कि क्या ऐसी परिस्थिति में भी 31 मई तक प्रतीक्षा करनी चाहिए और क्या तब तक नामर्दों की तरह फिरंगी दासता में घुटते रहना चाहिए ? तब सभाओं में सामूहिक मंत्रणा पर ऐसा विचार उत्पन्न होने लगा कि 10 मई, 1857 को रविवार था और सूर्यास्त के पूर्व सभी कैदी सिपाही बंधुओं की मुक्ति कराकर उन्हें सामूहिक रूप में दिल्ली की ओर प्रस्थान कर जाना चाहिए ।

10 मई, 1857 को पूरे दिन मेरठ छावनी में अजीब सी शांति के मध्य सिपाहियों में द्वंद्व यही चल रहा था कि फिरंगियों की संपूर्ण अथवा सांकेतिक हत्या की जाए ? अंततः निष्कर्ष यही निकला कि जो भी जैसा भी फिरंगी मिले उसे अंतोगति प्राप्त करा दी जाए । इसी क्रम में पास-पड़ोस के ग्रामों से भी सहस्त्रों ग्रामीण अनेक प्रकार के शस्त्रों के साथ छावनी के समीप एकत्रित हो गए थे । संध्या 5 बजे जब छावनी के चर्च का घंटा उस वातावरण में बजने लगा तब सभी अंग्रेज अपने परिवारों के साथ हंसते खेलते चर्च की ओर जाने लगे । उधर सिपाहियों की लाईन में एक ही धव्नि प्रारंभ हो रही थी 'मारो फिरंगी को !', जिसकी गर्जना शनैः शनैः प्रबलता धारण करने लगी थी । सिपाहियों द्वारा सर्वप्रथम कारावास से सभी 85 बंधुओं को मुक्त कराया गया और फिर कर्नल फिनीस से प्रारंभ अंग्रेजों के रक्तपात ने अत्यंत प्रचंड रूप धारण कर लिया जिसे सिपाहियों के दिल्ली की ओर प्रस्थान करने पर भी मेरठ के स्थानीय लोगों द्वारा पूर्णता प्रदत्त करने का संपूर्ण प्रयास किया गया । तब अकस्मात् हुए आक्रमण से मेरठ की शेष अंग्रेजी सेना इतना भयभीत हो उठी कि उनके द्वारा दिल्ली जा रहे विद्रोहियों का पीछा करने का प्रयत्न भी नहीं किया गया ।

तत्पश्चात अगले दिन प्रातः काल से ही मेरठ के स्वातंत्र्यवीर यमुना पार कर दिल्ली के लाल किले में प्रविष्ट हो गए और तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने नयी परिस्थितियों के कारण 31 मई तक प्रतीक्षा नहीं करते हुए स्वातंत्र्य की घोषणा कर दी तथा दिल्ली में भी अत्यधिक रक्तपात के साथ अंग्रेजी शासन के प्रतीकों को सर्वथा नष्ट कर दिया । मेरठ से प्रारंभ उस प्रचंड आग्नेय प्रकाश ने शीघ्र दावानल का स्वरूप धारण करना प्रारंभ कर दिया जिसने संपूर्ण उत्तर एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी सत्ता के आधार को न केवल चुनौती दी अपितु कई स्थानों पर लगभग 1 वर्ष तक स्वाहा भी कर दिया । परंतु अंततः 1857 की क्रांति अपनी योजना के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकी और लगभग एक वर्ष तक अत्यधिक संघर्ष के पश्चात दिल्ली, कानपुर, झांसी, जगदीशपुर समेत सभी स्थानों पर अंग्रेजी शासन ने स्थिरता पुनः प्राप्त कर लिया ।

1857 का शेष क्रम इतिहास के गर्भ में समाहित है परंतु मन में आज भी यह प्रश्न अवश्य विद्यमान है कि यदि समय के पूर्व 10 मई को ही मेरठ में स्वतः स्फूर्त विद्रोह के स्वर नहीं फूटे होते और गोपनीय रूप से निर्धारित 31 मई को ही सभी स्थानों पर एक साथ विद्रोह प्रस्फुटित हुआ होता तो क्या इतिहास किसी अन्य स्वरूप में विद्यमान रहा होता ? प्रश्न के उत्तर अनेक हो सकते हैं परंतु निश्चित ही मेरठ में उतपन्न अकस्मात् विद्रोह से गुप्त रूप से निर्धारित व्यापक योजना समय के पूर्व ही लघु स्वरूप में स्पष्ट हो गई जिसके कारण अंग्रेजों को सतर्क होने का कुछ अवसर अवश्य मिल गया और अंततः अत्यधिक क्रांतिवीरों के बलिदान के पश्चात भी इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी ! मेरठ में उस दिवस को घटित घटनाओं के साथ-साथ किसी भी संगठित योजना के प्रतिपादन के संदर्भ में सफलता हेतु धैर्य की आवश्यकता का स्मरण आवश्यक है ! इतिहास से प्रेरित चिंतन आवश्यक है !

10 मई, 1857 का वह ऐतिहासिक रविवार !

10 मई, 1857, मेरठ का स्मरण एवं ऐतिहासिक चिंतन ! 10 मई के आगमन पर रविवार होने के कारण यात्री मन सन् 1857 की उस तिथि का स्मरण कर रहा है जब ...