अंग में गंगा से वार्ता
आज प्रातः काल उठने के तुरंत बाद से ही गंगा से फिर वार्तालाप
करने का मन कर रहा था । चूंकि भागलपुर में गंगा मेरे निवास से ज्यादा दूर
नहीं है और आज रविवार का दिन भी था, अतः कार्यव्यस्तता के बीच कुछ पल चिंतन
हेतु निकालने की इच्छा लिए चल पड़ा गंगा किनारे । गंगा किनारे पहुंचने पर
भारत के सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण बिंदु रही इस सरिता से अपने
व्यक्तिगत जुड़ाव के बारे में भी मन स्मरणशील हो उठता है। गंगा से कुछ ही
दूरी पर बसे मेरे पैतृक ग्राम बीहट (बृहत्, बेगुसराय) के निवासीयों के जीवन
के हर महत्वपूर्ण कर्म में गंगा पूजन की परंपरा रही है और पूर्वजों की
अंत्येष्टि भी सिमरिया के घाटों पर सदियों से होती रही है । ऐसे में गंगा
से एक अंतरंग संबंध तो जन्म के कुछ महीनों पश्चात ही मुंडन संस्कार के समय
गंगा में पहली डुबकी लगाने के साथ स्थापित हो जाता है । फिर जीवनपर्यन्त
प्रातः काल हर गृह में स्नान करते हुए व्यक्तियों द्वारा उच्चारित एवं
गर्जित "हर हर गंगे" की ध्वनि मन में सदैव गूंजती रहती है ।
वैसे
तो मैं जन्म के लगभग एक वर्ष बाद ही गंगा किनारे से तब दूर हो गया था जब
पिताजी गुवाहाटी रिफाईनरी में पदस्थापित हो गए थे और इसके कारण मन आज गंगा
के साथ साथ ब्रह्मपुत्र के किनारे भी घटित बाल्यकाल की स्मृतियों को संजोये
है, पर जब छह वर्षों का हुआ तब पुनः गंगा ने मानो अपने समीप फिर बुला लिया
था और पिताजी बरौनी रिफाईनरी में 1986 से 1993 तक पदस्थापित रहे । इसके
बाद गंगा के समीप पिताजी का पदस्थापन बरौनी में पुनः 1998 से 2001 के बीच
रहा जब मैं गंगा के निकट ही आई आई टी कानपुर में अपनी पढाई कर रहा था ।
कानपुर में पढाई के दौरान ही गंगा के बिठूर घाट पर नियमित रूप से समय
मिलने पर जाने लगा था और गंगा से वार्तालाप करने का प्रयास करते घंटों
ध्रुव टीले पर बैठे मन चिंतन में डूब जाता था। बिठूर में ही बैठे बैठे कभी
पूर्ववर्ती ऋषियों की कल्पना करता तो कभी भारत के इतिहास और भविष्य के बारे
में चिंतन करता । बिठूर में जहाँ अनेक धार्मिक एवं पौराणिक स्थल सदियों से
उपासना के केंद्रों के रूप में प्रेरित करते थे, वहीँ 1857 की क्रांति के
अवशेष नाना साहब और तात्या तोपे जैसे राष्ट्रभक्तों की याद दिला जीवन में
कुछ सार्थक योगदान समर्पित करने के निमित्त मन को उद्वेलित करते थे ।
पुलिस सेवा में आने के बाद एक आई पी एस प्रशिक्षु के रूप में पुलिसिंग भी
मैंने गंगा किनारे अवस्थित भागलपुर जिले में ही सीखी जहाँ तीन माह तक मैं
कहलगाँव का थानाध्य्क्ष भी रहा । पुलिस अधीक्षक के रूप में भी शुरूआत
पाटलिपुत्र में गंगा किनारे स्थित कार्यालय से ही हुई और वहाँ से बगहा
रातोंरात स्थानांतरित होने पर यात्रा के क्रम में गंगा से हुई वार्ता मानस
पटल पर अंकित हो गई । फिर 2015 से लगातार पटना और मई 2017 से भागलपुर में
गंगा के साथ अनेक पड़ावों पर समय और गंगा के नित्य प्रवाह में वार्ता यात्रा
के क्रम में जारी है । इसी क्रम में आज अंग प्रदेश में विक्रमशिला सेतु के
निकट गंगा से वार्ता करने की इच्छा लिए रविवार को सार्थक करना चाहता था ।
उत्तर तथा दक्षिणी बिहार को जोड़ती विक्रमशिला सेतु के समीप वर्षा ऋतु में
बृहत् रूप धारण किए गंगा की तीव्र धाराएं पूर्ववर्ती शुष्क क्षेत्रों को भी
पुनः आद्र एवं प्लावित करती हुई समुद्र की ओर सतत् गतिशील रहती हैं । यहाँ
किनारे बैठकर धाराओं के तीव्र प्रवाह को देखते देखते मन अंग प्रदेश तथा
बिहार के इतिहास और भविष्य के चिंतन में लीन हो जाता है । एक तरफ जहाँ
महाभारत में अंग प्रदेश को महारथी कर्ण के राज्य के रूप में वर्णित किया
गया है, वहीं कर्ण के जन्म के साथ ही हस्तिनापुर से अंग की राजधानी चंपा की
यात्रा का माध्यम बनी गंगा से उनके जीवनपर्यन्त बने रहे संबंध की अवधारणा
भी स्पष्ट है । गंगा के किनारे ही अंगराज की दिनचर्या प्रारंभ होती थी
जिसने दानवीर के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करते भी संभवतः देखा होगा ।
चंपा जिसे ग्रंथों तथा पुराणों में विश्व का प्रथम नगर भी कहा गया है,
उसके निवासीयों ने कर्ण की स्मृतियों को परंपरागत रूप में संजोए रखा और
अवशेषों के रूप में कर्णगढ आज भी अनेक ऐतिहासिक रहस्यों को समाहित रखे हुए
है । चंपानगर के अवशेषों के ऊपर आज अंग्रेजों द्वारा लगभग 110 वर्ष पूर्व
स्थापित सिपाही प्रशिक्षण विद्यालय, नाथनगर है, जिसमें कहीं भी नए भवनों के
निर्माण अथवा पुराने भवनों के मरम्मत के निमित्त उत्खनन होने पर प्राचीन
चंपा के अवशेष निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं । 1969 से 1983 के बीच
प्रायोगिक (ट्रायल) उत्खननों में प्राचार्य निवास के निकट छठी शताब्दी ईसा
पूर्व तक के अनेक नगरीय अवशेष प्राप्त हुए थे । भागलपुर शहर से चंपानगर की
ओर बढने पर ऐसा अवश्य प्रतीत होता है मानो आप एक पुरानी सभ्यता के केंद्र
की ओर यात्रा कर रहे हो चूंकि मार्ग में आगे बढती हुई ऊँचाई स्पष्ट दिखते
हुए बगल के टीलों से पुरातन अवशेषों की झलकियाँ भी दिखाती है । गंगा के
उत्तरी छोर से इसे स्पष्ट देखा जा सकता है ।
चंपा के प्रारंभिक
इतिहास का वर्णन अनेक बौद्ध ग्रंथों में मिलता है जहाँ इसके एक बड़े और
सामर्थ्यशाली जनपद जिसमें बौद्ध धर्म स्थापित हो चुका था का रूप उभरता है ।
7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वैनसांग द्वारा भी चंपा को जहाँ समृद्ध और
ऐतिहासिक अवशेषों से परिपूर्ण पाया गया था वहीं वर्तमान भागलपुर के घाटों
पर घना जंगल भी स्थापित पाया था जिसके अवशेष अभी भी बरारी में महसूस किये
जा सकते हैं । आज भी यहाँ कुप्पाघाट के रूप में प्रसिद्ध गंगा तट पर भूमिगत
गुफा अपने सदियों पुराने इतिहास के रहस्यों को समेटे हुए है ।
गंगा
तट पर जब वर्तमान समय की दशा और दिशा के बारे में सोचने लगा तब अंग
क्षेत्र में फैले विशाल ऐतिहासिक अवशेषें पूर्व विरासत की याद दिलाने लगे ।
मन उस काल की कल्पना करने लगा जब सैकड़ों वर्ष पूर्व शिल्पियों ने गंगा तट
पर सुंदर मूर्तियाँ जहंगीरा (सुल्तानगंज), पत्थरघटा (बटेश्वरस्थान)आदि
स्थानों पर उकेरते हुए गंगा के बीचों बीच कहलगांव और जहंगीरा के द्वीपों पर
विशाल देवायत्तन स्थापित किए थे । विक्रमशिला विश्वविद्यालय की पूर्व में
प्रसिद्धि के बारे में जब मन सोचने लगा तब गंगा से वार्तालाप करने की फिर
इच्छा हुई और मन कहने लगा कि मातृसंज्ञा से विभूषित एवं सदियों से भारतीयों
द्वारा तीर्थरूप में पूजित हे देवी सरिते ! तुमने हिमालय से समुद्रपर्यन्त
अपने सतत् प्रवाह में इस क्षेत्र में इतिहास के प्रवाह को भी निकट से
अवश्य देखा होगा । अवश्य ही तुम्हारी तटों पर जहाँ तुमने अनेकों ऋषियों और
दार्शनिकों को चिंतन करते देखा होगा वहीं कालांतर में अनेक राजवंशों तथा
नगरों का उत्थान एवं पतन भी देखा होगा । तुमने ऐतिहासिक हस्तिनापुर,
प्रयाग, काशी, पाटलिपुत्र, कृमिला, मोदागिरी और चंपा में जहाँ सभ्यता का
उत्कर्ष देखा होगा वहीं उनके पतन की मूक साक्षी बन कारणों पर अवश्य चिंतन
और विश्लेषण किया होगा ।
ऐसे में इस युग में जन्मा यह भारत पुत्र
ऐतिहासिक बिहार की अंग भूमि पर विद्यमान होकर प्रश्न करना चाहता है कि आखिर
पूर्वकाल में अत्यंत समृद्ध रहा बिहार का यह विशाल क्षेत्र क्यों आज विश्व
के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता है । स्मरण करने पर दो से ढाई सहस्र
वर्ष पूर्व के बिहार का वह काल चिंतन के लिए विवश करते हुए अपने आप में
प्रेरित भी करता है चुकि उस काल में जब संचार के संसाधनों का घोर अभाव था
और आवागमन के मार्ग भी सुगम नहीं थे तब इसी क्षेत्र ने संपूर्ण भारतवर्ष को
एकत्रित कर कुशल नेतृत्व प्रदान किया था । तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में
मेगास्थनीज तथा अन्य लेखकों ने तो हमारे पाटलिपुत्र को तब के संसार के
सर्वोतम नगर के रूप में वर्णित भी किया था और यहाँ की अनुपम सभ्यता और
संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण की थी । फिर कालांतर में भला ऐसे कौन से कारण
रहे जो वर्तमान स्थिति के जन्मदायक बने और ऐसा क्यों है कि आज जब मानव
सभ्यता अतितीव्र विकास कर रही है जिससे बिहार का यह क्षेत्र भी अछूता नहीं
है और आगे बढ रहा है, वहीँ अन्य की अपेक्षा यहाँ गति कुछ मधम सी प्रतीत
होती दिखती है ।
गंगा से वार्तालाप के क्रम में सोचते सोचते अनेक
कारण मन में उभरे जो वर्तमान परिस्थितियों के बीजरूप में इतिहास पटल पर
अंकित होते गए जिसमें अनेकों इतिहास एवं कालजनित विसंगतियां यथा जातिवाद,
सम्प्रदायवाद, लिंगभेद इत्यादि से आधुनिक बिहारी समाज आज भी जूझ रहा है और
जिनके अवरोधों से आगे निकलने पर ही समग्र विकास अत्यंत गतिशील रूप लेता
प्रतीत होता है । गंगा मानो यह कह रही थी कि समयांतर में परिस्थितियों में
बहुत कुछ परिवर्तित होने पर भी उज्जवल भविष्य की विशाल संभावनाएं क्षीण
नहीं हैं । यदि कालांतर में परिवर्तन हुआ है तो उसका कारण संकीर्ण होती गई
मानसिकता ही है । उत्कर्ष के मूल तत्व तो आज भी वैसे ही हैं जैसे तब थे और
उत्कृष्ट प्रतिभा की भी पूर्व की भांति ही कमी नहीं है ।
जिस भूमि
ने कभी याज्ञवल्क्य, मैत्रैयी, जनक, चाणक्य और आर्यभट्ट जैसे विद्वानों को
ज्ञान अर्जित करते देखा था उसकी संतानें आज भी देश और विदेशों में अपनी
ज्ञानपूर्ण उपलब्धियों की पताका लहरा रहे हैं और भूमि को गौरवान्वित कर रहे
हैं । समस्या तो इसलिए है चूंकि वर्तमान पीढ़ी की असीम ऊर्जाओं का संचालन
सकारात्मक दिशा में न होकर पतनशीलता ग्रहण करने को आतुर है । समाज का जो
विकसित वर्ग पूर्व में व्यक्ति से व्यक्ति और व्यक्ति से समाज को परस्पर
जोड़कर समाज के उत्थान के निमित्त प्रयासरत रहता था वही आज जोड़-तोड़ और
विभाजन की नीतियों पर चलकर न तो अपना और न ही समाज का विकास कर पा रहा है ।
अधिकांशतः अनेक शिक्षित एवं संपन्न बिहारवासी यहाँ की समस्याओं को देखकर
बिहार के बाहर अनेकानेक क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं और सम्मिलित
भविष्य की चिंता छद्म होती जा रही है ।
गंगा मूक साक्षी बन देखती
रही है, परंतु अपने विशाल तटों पर पूर्व कृतियों की यादें समेटे युवा वर्ग
के लिए संदेश रखे है । वार्ता करने पर यह बताने को प्रयासरत है कि परिवर्तन
के निमित्त आवश्यकता है एक आवाह्न और संगठन की जो आगे चलकर एक वैचारिक और
सामाजिक क्रान्ति का रूप लेकर विकास को अवरोधों से मुक्त गति दे सके ।
इसमें मुख्य सहभागिता का दायित्व युवा वर्ग के कंधों पर ही है चूंकि बिहार
का अतीत प्रेरित करते हुए जहाँ वर्तमान के बारे में चिंतित करता है, वहीँ
अनिश्चित के गर्भ में प्रतीक्षा करता भविष्य आने वाली पीढ़ीयो को भी पूर्णतः
प्रभावित करेगा । युवा पीढ़ी के लिए यह समझना आवश्यक है कि अनिश्चित भविष्य
हमारी वर्तमान कृतियों पर निर्भर है और सभी से अपनी नियमित दिनचर्या के
अतिरिक्त कुछ आंशिक ही सही परंतु निरंतर योगदान की अपेक्षा रखता है । गंगा
मानो यह पूछती है कि क्या बिहार का युवा वर्ग इस चुनौती और परिवर्तन के लिए
तैयार है ?
गंगा किनारे #यात्री_मन चिंतन में डूबा है और इतिहास से प्रेरित परंतु उससे भी बृहत् एक अत्यंत उज्जवल भविष्य के नवनिर्माण की कल्पना लिए हुए है ।
